तपस्वी स्वामी भीष्म जी महाराज
7 March 1859 – 8 January 1984
क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी | आर्य समाज के स्तंभ | प्रखर समाज सुधारक
राष्ट्रनायक स्वामी भीष्म का ऐतिहासिक परिचय
स्वामी भीष्म जी महाराज (पूर्व नाम ब्रह्मचारी लाल सिंह) का जन्म ७ मार्च १८५९ को तत्कालीन पंजाब के करनाल जिले के पुंडरक गाँव में हुआ था। सन् १८७४ में अंग्रेजी पुलिस द्वारा उनके पिता श्री बारू राम पर किए गए अमानवीय अत्याचारों ने उनके बाल मन में राष्ट्र-स्वाभिमान की अग्नि प्रज्वलित की। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होकर, सन् १८७८ में उन्होंने ब्रिटिश सेना की ६२वीं पलटन के शस्त्रागार से बंदूकें एवं कारतूस जब्त कर एक दुस्साहसिक क्रांति का सूत्रपात किया। तदुपरांत, 'लेफ्टिनेंट समर सिंह' के छद्म नाम से हरिद्वार एवं मथुरा में अज्ञातवास काटते हुए उन्होंने देशभक्त क्रांतिकारियों के लिए अखाड़े संचालित किए।
सन् १८८६ में महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों से दीक्षित होकर उन्होंने आर्य समाज के माध्यम से समाज सुधार, नारी गरिमा की पुनर्स्थापना और सामाजिक समरसता की अलख जगाई। सन् १९०९ में पुरानी दिल्ली के दरीबा कलां में नारियों को अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराकर अदम्य पराक्रम का प्रदर्शन किया। स्वाधीनता के उपरांत उन्होंने ऐतिहासिक गो-रक्षा आंदोलन (१९६६) का नेतृत्व किया तथा सत्य एवं धर्म की स्थापना हेतु सदैव अग्रसर रहे। ८ जनवरी १९८४ को १२५ वर्ष की ऐतिहासिक आयु पूर्ण कर उन्होंने महासमाधि ली।
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण
ब्रह्मचारी लाल सिंह
१८७८ में ब्रिटिश सैन्य शस्त्रागार से विद्रोह कर सरकारी आयुधों के साथ प्रस्थान करते युवा क्रांतिदूत।
तपस्वी स्वामी भीष्म
अज्ञातवास के उपरांत संन्यास धारण कर उत्तर भारत में वैदिक मूल्यों एवं राष्ट्रभक्ति का अलख जगाते हुए।
आर्य समाज क्रांति
स्वामी श्रद्धानन्द जी के सहयोग से बाल विवाह उन्मूलन, शुद्धि आंदोलन और कन्या पाठशालाओं की स्थापना।
राष्ट्रीय संरक्षण व पत्राचार
उपराष्ट्रपति न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह एवं मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल के साथ ऐतिहासिक संवाद।
डिजिटल संग्रह वीथिका (Collections)
स्वतंत्रता आंदोलन
क्रांतिकारी संघर्षों में सहभागिता, मेरठ व हरिद्वार अज्ञातवास और ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम के प्रामाणिक साक्ष्य।
संग्रह देखें →आर्य समाज कार्य
महर्षि दयानन्द सरस्वती के सिद्धांतों पर आधारित सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलनों के पत्रक एवं पांडुलिपियां।
संग्रह देखें →महिला सशक्तिकरण
दिल्ली के दरीबा कलां में नारियों की रक्षा का ऐतिहासिक स्वांग और कन्या गुरुकुलों से संबंधित पत्राचार।
संग्रह देखें →गौ रक्षा आंदोलन
१९६६ के अखिल भारतीय गो-हत्या निषेध आंदोलन में स्वामी जी के सक्रिय नेतृत्व और गौ संरक्षण नीतियों की मूल फाइलें।
संग्रह देखें →राष्ट्रीय नेतृत्व पत्राचार
भारत के तत्कालीन शीर्ष प्रशासनिक एवं राजनीतिक नेतृत्व के साथ हुए आधिकारिक संवाद पत्र एवं हस्तलिपियां।
संग्रह देखें →"यह कुरुक्षेत्र की भूमि धर्म की भूमि है। यहाँ कृष्ण अधर्म के साथ नहीं, धर्म के साथ थे। आज कांग्रेस भ्रष्टाचार, गो-हत्या और भारतीय संस्कृति के दमन के अधर्म पर चल रही है। इसलिए असली कृष्ण हमारे साथ हैं और अधर्म की पराजय निश्चित है।"
— स्वामी भीष्म जी महाराज (१९६२ के ऐतिहासिक करनाल लोकसभा चुनाव के दौरान जनसभा में स्वामी जी का वक्तव्य)
जीवन यात्रा के पड़ाव (Era Timeline)
ऐतिहासिक शोध एवं साक्ष्य
स्वामी भीष्म शोध संस्थान का प्राथमिक उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम, वैदिक आंदोलन और सामाजिक सुधार के इतिहास को मूल रूप में सहेजना है। यहाँ संरक्षित हर पत्र, पुस्तक और संस्मरण शोधकर्ताओं को एक विश्वसनीय ऐतिहासिक आधार प्रदान करते हैं।
हमारा डिजिटल संग्रह इतिहास प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए खुला है। आप यहाँ स्वामी जी द्वारा लिखे गए ग्रंथों, उनकी हस्तलिपियों और समाचार पत्रों की ऐतिहासिक कतरनों का अवलोकन कर सकते हैं।
सभी ऐतिहासिक स्रोत देखें
ऐतिहासिक क्षण: उपराष्ट्रपति न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह एवं मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल जी के साथ स्वामी भीष्म जी महाराज।